I don't know how to write poems.Still....
जिन हाथो को पकड़ कर चलना सीखा
उन हाथो पर झुर्रीया पड़ते देखा हैं
जिन कंधो पे बैठ कर, दुनिया के तमाशे देखे हैं
आज उन कंधो को झुकते देखा हैं
जिन अटल पैरों ने हमें राह दिखाया
आज उन पैरों को कमजोर होते देखा हैं
जिनके चेहरे पे हमेशा मुस्कुराहट होती थी
आज उन्हे चिड़चिड़ाते देखा हैं
समय रेत है, काल चक्र अटल है,
सत्य है
ये सब सुना है।
मगर क्या कभी तू नहीं झुक सकता?
कभी तू नहीं रुक सकता? कभी तू नहीं थक सकता?
तू किस मिट्टी का बना हैं? क्या वो मिट्टी हमारे अपनों
को नहीं दे सकता?
